एक वो समय था जब किसी किताब तक पहुँचने के लिए पुस्तकालय का रास्ता पकड़ना पड़ता था या फिर काफी मशक्कत करनी पड़ती थी। साहित्यप्रेमियों को हमेशा ही किसी पत्रिका के नए अंक की प्रतीक्षा रहती थी और यदि किसी लेखक की नई रचना हाथ लग जाए, तो उसे पढ़ना एक छोटी-सी साहित्यिक घटना जैसा प्रतीत होता था। परन्तु अब समय बदल चुका है, किताबों की अलमारियों के साथ-साथ साहित्य हमारी हथेलियों पर भी बसने लगा है। एक स्क्रीन के खुलते ही कविता, कहानी, उपन्यास सब सामने उपलब्ध। यह सुविधा जितनी सामान्य दिखाई देती है, उसके भीतर परिवर्तन उतना ही गहरा है। हम केवल साहित्य पढ़ने का माध्यम ही नहीं बदल रहे, बल्कि साहित्य के साथ अपने संबंध का स्वरूप भी बदल रहे हैं, पढ़ने की गति, ध्यान का स्वभाव, रचनाओं की लंबाई और लेखक-पाठक के बीच की दूरी, इन सभी में महत्वपूर्ण परिवर्तन आया है।
समकालीन हिंदी साहित्य इसी परिवर्तनशील समय के बीच अपनी नई जमीन तलाश रहा है।
इंटरनेट ने हिंदी साहित्य को ऐसी व्यापक पहुँच प्रदान की है, जिसकी कल्पना कुछ दशक पहले तक कठिन थी। अब किसी छोटे शहर का लेखक बड़े साहित्यिक केंद्रों की स्वीकृति की प्रतीक्षा किए बिना ही अपनी रचना हजारों-लाखों पाठकों तक पहुँचा सकता है। कोई युवा पाठक किसी स्थापित लेखक के साथ-साथ नवोदित कवि या अपरिचित कहानीकार को भी पढ़ सकता है। फेसबुक जैसे सोशल मीडिया मंचों पर लंबे समय से लिख रहे साहित्यकारों और नए रचनाकारों, दोनों के लेखन को अब व्यापक पाठक मिल रहे हैं, उनकी कविताएँ, कहानियाँ, संस्मरण और विचार सीमित दायरे से निकलकर नए पाठकों तक पहुँच रहे हैं। सोशल मीडिया, डिजिटल पत्रिकाओं, साहित्यिक वेबसाइटों और ऑनलाइन प्रकाशन मंचों ने साहित्य के पारंपरिक केंद्रों को चुनौती दी है। लेखन अब केवल प्रकाशक, संपादक और मुद्रित पत्रिका के माध्यम से ही पाठकों तक नहीं पहुँचता बल्कि लेखक और पाठक के बीच प्रत्यक्ष संवाद की संभावनाएँ भी बढ़ी हैं।
वर्तमान में साहित्य का स्वरूप बहुत बदल चुका है कविताएँ छोटी-छोटी पोस्ट में सामने आती हैं जिन्हें इंस्टा पोएट्री या माइक्रो पोएट्री कहा जाता है ,कहानियाँ वीडियो के माध्यम से सुनाई जाने लगी हैं और विचार कुछ ही पंक्तियों में मात्र एक क्लिक से हजारों लोगों तक पहुँच जा रहा है, संक्षिप्तता ने अभिव्यक्ति को एक नया शिल्प दिया है। संक्षिप्त रचना अपने आप में कमजोर नहीं होती, देखा जाए तो एक दोहा, एक शेर, एक लघुकथा या कुछ पंक्तियों की कविता भी गहरे जीवन अनुभव को व्यक्त करने का पूर्ण सामर्थ्य रखती हैं, समस्या तो तब पैदा होती है, जब संक्षिप्तता केवल ध्यान आकर्षित करने का उपकरण मात्र बनकर रह जाती है और साहित्य का मूल्य उसकी वैचारिकता के बजाय उसकी वायरल क्षमता से आँका जाने लगता है। यह कहना अनुचित न होगा कि वर्तमान समय में जल्दी प्रसिद्धि प्राप्त करने की लोलुपता में कई रचनाकार पेड प्रमोशन यानि पैसे देकर अपनी रचना के प्रचार प्रसार में जुट जाते हैं, तब यह प्रश्न उठता है कि ऐसा साहित्य किस तरह से इस समाज का सूत्रधार बनेगा या भविष्य का निर्माण करेगा।
क्या किसी कविता की श्रेष्ठता इस बात से तय होगी कि उसे कितने लोगों ने शेयर किया? या किसी कहानी का महत्व उसके लाईक्स संख्या से निर्धारित होगा? क्या पाठक की तत्काल प्रतिक्रिया ही साहित्यिक मूल्यांकन का अंतिम आधार बन सकती है? ये प्रश्न डिजिटल माध्यम के विरोध में नहीं, बल्कि साहित्य की प्रकृति के पक्ष में उठाए जाने चाहिए। साहित्य का काम केवल क्षणिक आनंद प्रदान करना या तत्काल भावुक कर देना ही नहीं है, वह कई बार पाठक को असुविधा में डालता है, उसके पूर्वाग्रहों को चुनौती देता है और उसे उन प्रश्नों से सामना कराता है, जिनसे वह बचना चाहता है।
भारत के कई गाँवो अथवा कस्बों इत्यादि तक लाइब्रेरी या अन्य साहित्यिक स्रोतों की दूरी आज भी विद्यमान है किन्तु डिजिटल माध्यमों ने हिंदी साहित्य के पाठक वर्ग का चौतरफा विस्तार किया है, अब वे लोग भी कविता, कहानी और उपन्यास तक पहुँच रहे हैं जो पहले साहित्यिक पुस्तकों से दूर थे या उनकी पहुँच में नहीं थे, यह हिंदी के लिए शुभ संकेत है। लेकिन पाठक संख्या और पाठकीय संस्कार में अंतर होता है किसी रचना को हजारों लोग पढ़ लें, यह उत्साहजनक तो है परंतु क्या वे उसे समझने, उस पर विचार करने और उसके साथ कुछ समय बिताने के लिए भी तैयार हैं? या क्षणिक जानकारी तक ही सीमित हैं, स्क्रीन पर पढ़ते समय पाठक का ध्यान लगातार दूसरी सूचनाओं की ओर खिंचता रहता है। कम शब्दों में लिखा है तो ठीक नहीं तो स्क्रीन पर लगातार आते नोटिफ़िकेशन, वीडियो और विज्ञापन उसकी एकाग्रता को प्रभावित करते हैं। इसके साथ ही आज जब साहित्य इतनी सुगमता से लेखकों व पाठकों को जोड़ रहा है, ऐसा न हो कि वे इसके महत्व को भूलने लगें व साहित्य मनोरंजन मात्र बनकर रह जाए। ऐसे समय में साहित्य की चुनौती केवल पाठक तक पहुँचना नहीं है, बल्कि पाठक को रोकना भी है, साहित्य को पाठक का ध्यान आकर्षित करने के बाद उसे विचार की गहराई में ले जाना होगा। यदि साहित्य केवल स्क्रॉल किए जाने वाली सामग्री बनकर रह गया, तो उसकी आत्मा कमजोर पड़ जाएगी।
डिजिटल युग ने साहित्य को सुनने की संस्कृति को भी विस्तार दिया है। किसी यात्रा के दौरान सुनी गई कोई प्रेम कहानी, कोई काम करते वक्त सुनी गई लयबद्ध कविता या रात में सोने से पहले कोई जासूसी उपन्यास सुनना साहित्य के अनुभव को एक नया आयाम देता है, यह भारतीय समाज की वाचिक परंपरा से भी जुड़ता है। लोकगायन, आल्हा और लोकगाथाएँ हमारी सांस्कृतिक स्मृति का हिस्सा रहे हैं, डिजिटल ऑडियो माध्यम उसी परंपरा को आधुनिक तकनीकी रूप दे रहे हैं। वर्तमान में साहित्य के सामने सबसे बड़ा संकट सामग्री की कमी नहीं, बल्कि सामग्री की अधिकता है। हर दिन हजारों कविताओं कहानियों,लेखों की बौछार होती है, ऐसे में अच्छी रचना का सामने आना और टिकना कठिन हो जाता है। जब हर व्यक्ति लेखक और प्रकाशक दोनों बन सकता है, तब यह पहचानना अधिक कठिन हो जाता है कि क्या पढ़ा जाए और किस पर भरोसा किया जाए।
इसके साथ-साथ कॉपीराइट, मौलिकता, बिना श्रेय के उपयोग, AI-जनित कंटेंट और एल्गोरिदम- आधारित लोकप्रियता जैसे प्रश्न भी गंभीर होते जा रहे हैं, साहित्यिक मंचों को इन प्रश्नों से बचकर नहीं, बल्कि स्पष्ट नीतियों और संपादकीय जिम्मेदारियों के साथ निपटना होगा, डिजिटल साहित्य को केवल तेज़ नहीं विश्वसनीय भी होना होगा, उसे केवल लोकप्रिय नहीं सार्थक भी होना होगा, उसे केवल अधिक लोगों तक पहुँचना नहीं, बल्कि पाठकों के भीतर कुछ स्थायी प्रभाव भी छोड़ना होगा। यह हमें तय करना होगा कि हम साहित्य को केवल उपभोग की वस्तु बनाना चाहते हैं या अनुभव और विचार का माध्यम भी बनाए रखना चाहते हैं। क्या हम ऐसी हिंदी चाहते हैं, जो केवल वायरल हो, इंस्टाग्राम और फेसबुक पर पोस्ट की जा सके, या ऐसी हिंदी भी, जो पाठक के भीतर लंबे समय तक बनी रहे तथा उसके विचारों को परिमार्जित भी करती रहे? हमें ऐसी हिंदी चाहिए, जो परंपरा से जुड़ी तो हो, लेकिन तकनीक से भयभीत न हो, जो नई पीढ़ी से संवाद तो करे, लेकिन अपनी गंभीरता न खोए, जो लोकभाषाओं को सम्मान दे, लेकिन भाषाई संकीर्णता से मुक्त रहे, और जो AI का उपयोग करे, लेकिन मनुष्य को साहित्य के केंद्र से हटने न दे। क्योंकि अंततः साहित्य का प्रश्न यह नहीं है कि वह किस माध्यम पर लिखा या पढ़ा जा रहा है, असली प्रश्न यह है कि वह मनुष्य को कितना अधिक मनुष्य बना पा रहा है।
माध्यम बदलते रहेंगे, स्क्रीन बदलती रहेंगी, तकनीक बदलती रहेगी, लेकिन मनुष्य की अपनी कथा कहने, दूसरों की कथा सुनने और जीवन को अर्थ देने की आवश्यकता बनी रहेगी। हिंदी साहित्य की वास्तविक शक्ति इसी निरंतरता में है।
-सुरेन्द्र कुमार तिवारी
