आग के भीतर खड़ा एक मन!
दिया बुझ गया और,जल उठे हमदिये का बुझना उसकी नियति थीऔर जलना हमारीपर एक रोज कोई आएगादिये को नई बाती
दिया बुझ गया और,जल उठे हमदिये का बुझना उसकी नियति थीऔर जलना हमारीपर एक रोज कोई आएगादिये को नई बाती
“मैं तुम्हारे साथ हूँ /उस स्वप्न में / जो तुम्हारा है। / हमारा है। / सिर्फ मेरा नहीं!” कुँवर नारायण
खिड़की से आती धूपजहाँ जहाँ पड़ती हैवहां महसूस होती है एक गहरी चुभनचुभन जो खुरेच कर लाती है अपार पीड़ाजो
ऋचाओं से जातक कथाओं तक, फिर भ्रंश होकर बही हो तुम; हो किसी पर्वत के पिघलने की कहानी, यानी इक
एक वो समय था जब किसी किताब तक पहुँचने के लिए पुस्तकालय का रास्ता पकड़ना पड़ता था या फिर काफी