
ऋचाओं से जातक कथाओं तक, फिर भ्रंश होकर बही हो तुम;
हो किसी पर्वत के पिघलने की कहानी, यानी इक नदी हो तुम।
है पांडित्य सिद्धों सा सरह का, डटी गोरखनाथ सी हठी हो तुम;
गीत रासो की, वसंत विलासों की या महापुराण तिरसठी हो तुम।
संस्कृति संस्कारों की, हर गली, हर नगर-गाँवों का विकास हो;
आभास हो सभ्यताओं की स्मृतियों का, सिर्फ़ भाषा नहीं हो तुम
लिए साथ सदियों के इतिहास को निकली हो तुम, हिंदी हो तुम!
गाथाएँ हो प्राकृत की, पहेलियाँ खुसरो की या पदावली हो तुम;
राह कठिन है सवाल कठिन, कब बनी हो, कहाँ से चली हो तुम?
सूफी हो, जायसी की अवधी हो, नूर मुहम्मद की बाँसुरी हो तुम;
सखी हो सूर की, साखियाँ कबीर की, मानस की तुलसी हो तुम।
कुछ भ्रमर-गीत, कुछ पद-भजन, स्वर्ण-युग की बात बताओ;
सुनाओ कुछ मीरा की तान, बहती हुई ब्रज की कालिंदी हो तुम।
हिंदी है गगन-उपवन, यह वतन हिंदी, हिंदी हैं हम, हिंदी हो तुम!
सुना है, रीति की भीति में बंधी हुई कई दरबारों में गई हो तुम;
कहो कुछ सुजान की, मतिराम की, बिहारी की सतसई हो तुम।
बदल-सा गया रंग-रूप तुम्हारा, जबसे दरबारों से निकली हो तुम;
कामायनी प्रसाद की, तुम ही महादेवी और जूही की कली हो तुम।
सुनाती हो कथाएँ प्रेमचंद की, गुनगुनाती हो बच्चन की रुबाइयाँ;
चेतना बादलों की, रश्मि दिनकर की और हिमतरंगिणी हो तुम।
भारतेंदु की तराशी, ‘नए युग के नए चाल की नयी हिंदी हो तुम’!
-शिवेन्द्र पटेल
