
खिड़की से आती धूप
जहाँ जहाँ पड़ती है
वहां महसूस होती है एक गहरी चुभन
चुभन जो खुरेच कर लाती है अपार पीड़ा
जो जला रही है खाल धीरे-धीरे अंदर तक,
फफोले घिनौने जिस्म के उस भाग पर
धूप जिसको सेंकती है आग पर,
मन मौन सहता हर एक क्षण
शाश्वत नहीं देह का कोई कण,
हर साँस में तपिश
हर स्पर्श में काँटों का स्पंदन,
मन मौन ही सही
करता क्यूँ नहीं क्रंदन
लाख अनिश्चितताएं,
हों घोर अस्वीकार,
राख के नीचे दबी चिंगारी सा
जीवन पुकारे बार बार।
-सुरेन्द्र कुमार तिवारी
