
परिंदे
पूर्वाग्रह बना लेते हैं!
कुछ परिंदे,
बैठने से पहले ही
उड़ जाने का मन बना लेते हैं।
कुछ सोचकर ही तुमने
कलाई आगे नहीं की,
मेरे हाथ तो
रंग-बिरंगे कंगन बना लेते हैं।
चिड़िया आयेगी तो कहाँ रहेगी?
सोचता है बच्चा!
..घर बाद में बनाएंगे,
पहले आँगन बना लेते है।
बच्चे पुचकार के बोले, “ऐ पेड़
हमें वो वाला जादू सिखाओ ना!
जिसमे बीज..,
मिट्टी खाकर जंगल बना लेते हैं।”
—
पेड़
लोग हुए स्वार्थी और,
सभ्यताएँ रहीं मौज में।
फड़फड़ाते रहे पंछी,
घोंसले की खोज में।
आसरे की खोज में,
सियार दुम हिलाते रहे।
आए दिन जंगल तमाम,
मातम के गीत गाते रहे।
डबडबाई आँखें धुंधला गईं,
आस की तरह।
अफ़सोस!
घरौंदे बिखर गए ताश की तरह!
‘जियो और जीने दो’ के नारे,
बेशुमार लगते रहे।
कितने मासूम हैं पेड़ बेचारे,
इंसान ठगते रहे।
झरते रहे रंग-बिरंगे फूल,
शाखों से बेशुमार।
चलते रहे सिलसिलेवार,
तनों पे,
आरे धारदार।
घुट-घुट के घटते रहे दरख़्त,
विश्वास की तरह,
और,
कट-कट के गिरते रहे, लाश की तरह।
—
नदी
और, फिर नदी बहती जाती है,
देखते रह जाते हैं, तटस्थ होकर ‘तट’।
और,
‘देवता’ हो चुके पत्थर भी नहीं थाम पाते हाथ,
बहुत देर तक।
और वे,
जिन्हें नहीं होना था ‘देवता’,
करते हैं पीछा, कुछ दूर तक,
और चोट खाकर हो जाते हैं ‘रेत-बजरी’,
फिर वे भी लग जाते हैं किनारे।
लेकिन तब भी, दुनिया खत्म नहीं होती,
चुक जाती नहीं बहारें।
और, नदी बहती जाती है।
समय, जीवन और नदी
रूकते नहीं कभी!!
—
-शिवेन्द्र पटेल

Aapki kavitaen padh kar aisa laga jaise shabdon ne dil se baat kar li.