दिया बुझ गया और,
जल उठे हम
दिये का बुझना उसकी नियति थी
और जलना हमारी
पर एक रोज कोई आएगा
दिये को नई बाती से जलाएगा
वह फिर जलेगा और नया जीवन पायेगा,
हमें कौन बचाएगा,
दिया जल कर नया जीवन पाता है
उसकी लालिमा उसके अस्तित्व का प्रमाण देती है,
जल हम भी रहे हैं
पर इस आग में हमारा अस्तित्व खो रहा है,
इसमे न आग है
न उसकी लालिमा
और रोशनी का तो कोई नाम नहीं,
पर इंतज़ार हमे भी है,
उसका, जो ये आग बुझाये, हमारे अस्तित्व को बचाये
कोई क्यों आएगा, क्यों बचाएगा
क्या इस डर से, कि वह भी झुलस जाएगा
पर क्या मेरे भीतर की आग किसी और को जला पाएगी?
नहीं…
शायद हाँ!
नहीं इसलिए कि उसका कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं
और हाँ इसलिए कि मनोविज्ञान इसके पक्ष में है।
मेरा जलना मेरे नाश का द्योतक है
यदि मैं तपता तो शायद कुछ बन पाता,
पर जल कर तो राख ही होना है
क्या जलना मैंने स्वयं से स्वीकार किया है
नहीं…
क्यों नही!?
क्योंकि राख होना कौन चाहता है
क्या राख की कोई उपयोगिता है?
हाँ होगी…पर कम, बहुत कम, मेरे इतना कम।
सवाल छोटा है…
कब तक और कितना जलना पड़ेगा?
कुछ क्षण? कुछ दिन? कुछ वर्ष? या फिर जीवन भर?
यदि जीवन भर के लिये है तो,
जीवन कब तक का है? छोटा, बड़ा या बहुत बड़ा?
छोटा है तो स्वीकार्य है
बड़ा है तो असहनीय होगा।
आख़िर क्यों सहें?
दिया जल कर प्रकाश देगा
हम जल कर अंधकार में विलीन होंगे
हमारा जलना निरर्थक है!
पर,
जीवन पथ पर पूर्ण पुरुष हर पीड़ा को सहते हैं,
नहीं ठूँठ, वे तेज सूर्य सा मस्तक पर जलते हैं।
तो फिर तपना है, सूर्य सा जलना है
मगर उस आग में जले मेरा भय, शंका, मेरी हार
जले निरुत्साह मन का गान, जले सारा अहंकार
जले वो सीढ़ी
जो मुझे बार-बार
अपने ही अँधेरे में खींचती है,
अब,
आग के भीतर खड़ा एक मन,
खोजता अपने होने का अर्थ
भीतर धधक रहा गगन,
तप रहा तन,
तप रहा जीवन,
जल रहा संशय क्षण-क्षण,
तो,
जलना स्वीकार्य है
रुकना नहीं,
तपना स्वीकार्य है
टूटना नहीं।
~सुरेन्द्र कुमार तिवारी

अति सुंदर!