मनुष्योचितता से परिपूर्ण वैचारिकता के कवि :  कुँवर नारायण

“मैं तुम्हारे साथ हूँ /उस स्वप्न में / जो तुम्हारा है। / हमारा है। / सिर्फ मेरा नहीं!”

कुँवर नारायण समकालीन कविता की लोकतंत्रात्मक परिधि में मनुष्योचितता से परिपूर्ण वैचारिकता के कवि हैं। वे मनुष्य जीवन को सार्थकता की श्रेणी में जिये चले जाने के प्रबल पक्षकार बनकर कविताओं में उपस्थित होते हैं। उनके यहाँ मनुष्य का वही रूप दिखाई पड़ता है जो और अधिक मानवीय होने के क्रम में गतिशील है। भीषण दुर्व्यवस्था के समय में भी,वे ऐसे मानवीय चरित्र की उपस्थिति चाहते हैं, जो हर परिस्थिति में मनुष्योचित व्यवहार की गरिमा को बचाए रखने में सफल हो सके। कवि का स्वयं का पक्ष भी इसी मानवीयता के अधिक निकट आकर टिकता है। उनके काव्य संसार में विचारों का किसी भी तरह से जबरिया पिष्टपेषण नहीं है। अपितु नवीन मान्यताओं का सुंदर संयोजन ही हुआ है। कवि ने आत्मजयी में कठोपनिषद से कथा सामग्री अवश्य ली है किंतु वहां भी उनकी स्वयं की विचार श्रृंखला का उन्नयन ही समाविष्ट हुआ है। घोर बाज़ारवादी व्यवस्था में उनकी कविताएं उस मोहक दीपक का भास कराती हैं,जो तमस के विपर्यय का प्रतीक होता है। इस बाज़ारी दुनिया के यथार्थ को उनकी कविताएं पाठकों के सामने सीधा खड़ा कर देती हैं।

जब वे लिखते हैं “बाज़ार-/जहाँ ज़रूरतों का दम घुटता है,/बाज़ार -/जहाँ भीड़ का एक युग चलता है,” इस विनाशक परस्थिति में कवि का प्रयास यही है कि मनुष्य किसी भी तरह इस अभेद्य तमसजड़ित धोखे से बच निकले। जहां सब कुछ विक्रय की भाषा बोलता है। संवेदनाओं से लेकर सम्बन्धों के माधुर्य तक,सबकी क़ीमत लगा चुका है यह बाज़ार। और सच इतना ढंक गया कि दिखाई देता ही नहीं। वे लिखते हैं “सच्चाई /विज्ञापनों के फुटनोटों में / इतनी बारीक़ और धूर्त भाषा में छपी / कि अपठनीय” इस चालाकी भरी छद्म व्यवस्था से मनुष्य को सावधान करने का उद्यम यह कविता कर रही है। जहां सच्चाई को ऐसे लबादे में ढांक दिया जा रहा है कि उसका स्वाभाविक स्वरूप सामान्य मनुष्य की चेतना दृष्टि में ही ना आने पाए। ऐसी स्थिति में कविता ही है जो मनुष्य को सजग कर सकती है। इस दृश्यित किंतु फिर भी अदृश्य ख़तरे से बचा ले जाने का आह्वान करती दिखती है। यह कविता “कविता वक्तव्य नहीं गवाह है / कभी हमारे सामने / कभी हमसे पहले कभी हमारे बाद / कोई चाहे भी तो रोक नहीं सकता / भाषा में उसका बयान / जिसका पूरा मतलब है सचाई / जिसकी पूरी कोशिश है बेहतर इन्सान” पंकज चतुर्वेदी ने इनके संदर्भ में लिखा “आदर्श और यथार्थ, ज्ञान और संवेदना, समय और इतिहास की द्वन्द्वात्मक संहति से कुँवर नारायण की कविता संश्लिष्ट, गहन और विचारोत्तेजक है। उससे हम अपनी आत्मा को आलोकित और समृद्ध कर सकते हैं; क्योंकि उसमें वाग्जाल नहीं, एक मार्मिक पारदर्शिता और जीवन-सत्य का दुर्लभ विवेक है। अक्सर उनकी कविता में जो क्लासिकल अनुशासन नज़र आता है; उसकी बुनियाद में बुद्ध के ‘मध्यम मार्ग’ के प्रति उनकी सुचिंतित आस्था है। अतियों से भरसक बचते हुए एक द्वन्द्वात्मक सन्तुलन को वे सम्भव करते हैं।”

मनुष्यता का नैतिक मूल्यों पर टिका हुआ ढांचा उनकी रचनाओं के बिल्कुल बीच में उपस्थित रहता है। यांत्रिक होते मनुष्य को संवेदनशील बनाए रखने की चिंता स्पष्ट दिखाई देती है। अवसाद और गहरी असंवेदनशीलता में जकड़ा समाज सच्चाई को निरन्तर निगलने की दिशा में सुरसा की तरह मुंह बढ़ाए जा रहा है। सारी नैतिकताएं चबा जाने को आतुर है। लेकिन कवि इसका विपर्यय चाहता है। कविता में इसकी उपस्थिति कुछ इस तरह दिखाई देती है। “अबकी अगर लौटा तो / हताहत नहीं / सबके हिताहित को सोचता / पूर्णतर लौटूंगा।” जहां कवि की मानवीय दृष्टि के उदात्त स्वरूप का विस्तार दिखाई देता है। तुलसीदास के यहाँ जिसे परहित कहा गया है। इससे बढ़कर कोई धर्म नहीं होता। तुलसी रामचरितमानस में कहते हैं “परहित सरिस धरम नहीं भाई, पर पीड़ा सम नहीं आधमाई” कुंवर नारायण के यहाँ भी इसकी दृष्टि का विस्तार दिखाई देता है। वे कविताओं में इसी नैतिक जिम्मेदारी की बात करते हुए दिख जाते हैं। पुरुषोत्तम अग्रवाल ने लिखा है “अहिंसा दृष्टि उनकी समूची काव्य वस्तु में व्याप्त है।”

इक्कीसवीं सदी में इनकी कविताएं अहिंसा के आग्रह की कविताएं हैं, सच की अभिव्यक्ति के संबल की कविताएं हैं, समूचे संसार के प्रति प्रेम और करुणा की कविताएं हैं। जहां संकटों की आहटें भी हैं और उनसे जूझने की संकल्पता भी उपस्थित है। तभी तो कवि कह उठता है “आत्मा पर / किसी बहुत बड़े प्यार का ज़ख़्म होता / जो कभी न भरता।” कवि ने प्रयास किया है कि स्वार्थवादी घोर एकलताई से भरे मनुष्य में प्रेम का उत्स निकल पड़े। जिससे प्रेम जनित सम्बन्ध अटूट रहे और सच्चाई पर किसी तरह का ग्रहण ना लगने पाए। इसकी चिंता उनकी कविताओं में वर्णित होती रही है उनकी यह कविता जिसमें इस तरह की चिंता स्पष्ट दिखती है “सभी चाहते कि शब्दों के बीच / सचाई को ज़्यादा-से ज़्यादा जगह मिले / लेकिन परेशान हैं इन दिनों / काले की जगह / सफ़ेद नामक झूठ ने ले ली है / और दोनों ने मिलकर / एक बहुत बड़ी दूकान खोल ली है।” लेकिन केवल प्रश्न खड़े कर देना भर उन्हें ठीक नहीं लगता, अपितु समाधान की ओर भी वे संकेत करते हैं। और सकारात्मकता का संचार कर देते हैं। और कह देते हैं “बस, हाथ भर की दूरी पर है / वह जिसे पाना है।”

भय और आशंका से भरा हुआ समाज जिन जटिलताओं से ग्रस्त होता जा रहा है, उसकी अभिव्यक्ति में कविता भी जटिलता ग्राही होती जा रही है। इन जटिल अभिव्यक्तियों को कुंवर नारायण की कविता में सहजता से उद्घाटित किया गया है। कवि का श्रेष्ठ यही है कि जटिल से जटिल अभिव्यक्ति को सहजतम की ओर धकेल दे, समाज में बढ़ते भय की उपस्थिति उनकी इस कविता में बहुत सूक्ष्मता से पिरो दी गई दिखती है। “एक अज्ञात भय यह कहता रहा कि दरवाज़ा न खोलूँ : / इसी में खैरियत है कि चुप रहूँ-न बोलूँ। / क्या पता आदमी ऊपर से ठीक-ठाक हो / लेकिन अन्दर से भेड़िए-सा ख़तरनाक हो !”

हिंदी कविता पर बाजारवाद के प्रभावी होने की आशंका को लेकर पंकज चतुर्वेदी ने एक साक्षात्कार में उनसे एक प्रश्न पूछा जिसमें उनकी कही गई बात उनके कवि व्यक्तित्व को समझने में गहरी भूमिका रखती है। दोनों की बात चीत इस प्रकार है,

“पंकज – साम्यवादी व्यवस्थाओं के बिखराव और पराभव के बाद जो एकध्रुवीय विश्व बना है और जो बाज़ार केन्द्रित सभ्यता अस्तित्व में आई है, हिन्दी कविता पर उसका क्या असर पड़ा है?”

“कुँवर नारायण – कलाएँ हमेशा वैश्विक या घुमन्तू रही हैं। विभिन्न देशों में कलाकारों की नियमित आवाजाही रही है। बुद्ध के समय से ही। कलाएँ, बड़े विचार और साहित्य हमेशा यात्री (‘ट्रैवेलर’) रहे। रही बाज़ार के वर्चस्व की बात, तो यह बहुत कुछ कवि पर निर्भर करता है। हम हर बार दबाव के सामने घुटने टेक दें, यह ज़रूरी नहीं है। जैसे नैतिकता का संघर्ष है। यह एक बिलकुल निजी तरह का संघर्ष है। व्यवसायीकरण या व्यावसायिकता को हम ख़ारिज नहीं कर सकते। उससे समझौता तो करना पड़ेगा-ग़लत समझौता नहीं करना चाहिए। यह मजबूरी हो सकती है कि हम घूस दें, लेकिन घूस लेने की कोई मजबूरी नहीं हो सकती। हम एक सामान्य नियम बना लेते हैं। जैसे चारों ओर भ्रष्टाचार है, इसलिए हम भी भ्रष्ट हैं। बहुत-सी बहसों को हम ध्रुवान्तों (‘एक्स्ट्रीम्स’) पर रखकर सोचते हैं, लेकिन मध्य की व्यावहारिक ज़मीन पर रखकर देखें, तो ज़्यादातर समस्या तो वहीं हल हो जाती है, जिसे बुद्ध मध्यम-मार्ग कहते हैं।

“कवि कुंवर नारायण को याद करते हुए जन्म जयंती पर नमन”

दुर्गेश कुमार सजल
शोधार्थी, हिंदी विभाग, डॉ. हरीसिंह गौर केंद्रीय विश्वविद्यालय, सागर

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